El Nino Effect On Monsoon: भारत की खेती पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है। हर साल मानसून की चाल देश के करोड़ों किसानों की आय, फसल उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। ऐसे में अगर मानसून से जुड़ा कोई भी बड़ा संकेत सामने आता है, तो उसका समय रहते आकलन और समझ बेहद जरूरी हो जाता है। हालिया जलवायु संकेतों और मौसम विशेषज्ञों के विश्लेषण से यह साफ हो रहा है कि आने वाले मानसून पर एल-नीनो का प्रभाव देखने को मिल सकता है, जो किसानों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
ला-नीना से न्यूट्रल स्थिति की ओर बढ़ता मौसम चक्र
फिलहाल वैश्विक मौसम प्रणाली में ला-नीना की स्थिति बनी हुई है। आमतौर पर ला-नीना को भारत के लिए अनुकूल माना जाता है क्योंकि इससे मानसून मजबूत रहता है और वर्षा का वितरण बेहतर होता है। लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि यह स्थिति ज्यादा लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है। धीरे-धीरे ला-नीना कमजोर पड़ रहा है और अनुमान है कि फरवरी के मध्य तक यह पूरी तरह न्यूट्रल यानी तटस्थ अवस्था में बदल सकता है।
न्यूट्रल स्थिति का मतलब यह नहीं होता कि मौसम पूरी तरह सामान्य रहेगा। यह एक संक्रमणकाल होता है, जहां आगे किस दिशा में बदलाव होगा, यह आने वाले महीनों में तय होता है। यही वह समय होता है जब मौसम मॉडल और समुद्री तापमान पर बारीकी से नजर रखी जाती है।
एल-नीनो की आहट और बढ़ती चिंता
सबसे बड़ा सवाल यह है कि न्यूट्रल स्थिति के बाद मौसम किस ओर जाएगा। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल एल-नीनो के विकसित होने के संकेत मिल रहे हैं। इसे “इवॉल्विंग एल-नीनो” कहा जा रहा है, यानी ऐसी स्थिति जो धीरे-धीरे बनती है और मानसून के दौरान अपना असर दिखाती है।
इस तरह का एल-नीनो मानसून की शुरुआत में ज्यादा असर नहीं डालता, लेकिन जैसे-जैसे मौसम आगे बढ़ता है, खासकर जुलाई और अगस्त के महीनों में, इसका प्रभाव तेज हो जाता है। यही वह समय होता है जब खरीफ की फसलों को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है।
मानसून के दूसरे चरण पर ज्यादा खतरा
मौसम से जुड़े मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि मानसून के दूसरे भाग में एल-नीनो की सक्रियता 50 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। इसका सीधा असर बारिश के वितरण पर पड़ सकता है। कुछ इलाकों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है, जबकि कहीं-कहीं असामान्य बारिश भी देखने को मिल सकती है।
एल-नीनो के दौरान अक्सर ऐसा देखा गया है कि मानसून कमजोर पड़ जाता है या लंबे समय तक ब्रेक लेता है। इससे खेतों में नमी की कमी हो जाती है और फसलों की बढ़वार पर नकारात्मक असर पड़ता है।
पिछले अनुभव क्या कहते हैं?
इतिहास पर नजर डालें तो कई ऐसे साल रहे हैं जब इवॉल्विंग एल-नीनो ने देश को मुश्किल में डाला। 2014 और 2018 जैसे वर्षों में मानसून का दूसरा हिस्सा कमजोर रहा, जिससे कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन गई। इन वर्षों में किसानों को उत्पादन में भारी नुकसान झेलना पड़ा और जल संकट भी गहराया।
इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि अगर एल-नीनो ला-नीना के तुरंत बाद आता है, तो उसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। यही कारण है कि इस साल की स्थिति को हल्के में लेना सही नहीं होगा।
खेती और फसल योजना पर संभावित प्रभाव
अगर मानसून का वितरण बिगड़ता है, तो इसका सबसे पहला असर खरीफ फसलों पर पड़ता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी फसलें मानसून की बारिश पर काफी हद तक निर्भर होती हैं। पानी की कमी या असमान बारिश से बीज अंकुरण से लेकर फसल पकने तक हर चरण प्रभावित हो सकता है।
इसके अलावा, जलाशयों और भूजल स्तर पर भी असर पड़ता है, जिसका प्रभाव रबी की फसलों तक पहुंच सकता है। यानी एल-नीनो का असर सिर्फ एक मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे कृषि चक्र को प्रभावित कर सकता है।
किसानों के लिए क्या है सही रणनीति?
इस संभावित स्थिति को देखते हुए किसानों को अभी से सतर्क हो जाना चाहिए। सबसे पहले फसल चयन और बुवाई के समय पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। कम पानी में तैयार होने वाली या सूखा सहन करने वाली किस्मों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
साथ ही, खेतों में जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी है। मेड़बंदी, मल्चिंग, और ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकें पानी की बचत में मदद कर सकती हैं। मौसम पूर्वानुमान पर लगातार नजर रखना और स्थानीय कृषि सलाह का पालन करना भी फायदेमंद रहेगा।
आगे के महीनों में मिलेगी ज्यादा स्पष्टता
फिलहाल यह ध्यान रखना जरूरी है कि मानसून अभी दूर है और मार्च के बाद आने वाले आंकड़े स्थिति को और स्पष्ट करेंगे। समुद्री सतह के तापमान और वायुमंडलीय बदलावों के आधार पर पूर्वानुमान को लगातार अपडेट किया जाएगा।
हालांकि अभी से यह कहना मुश्किल है कि मानसून पूरी तरह खराब रहेगा, लेकिन जोखिम के संकेत जरूर मौजूद हैं। इसलिए तैयारी और जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।
बदलती जलवायु में सतर्कता ही समाधान
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम पहले से ज्यादा अनिश्चित हो गया है। कभी अत्यधिक बारिश तो कभी लंबा सूखा अब आम बात होती जा रही है। ऐसे में किसानों को सिर्फ अच्छे मानसून की उम्मीद पर निर्भर रहने के बजाय हर संभावित स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।
एल-नीनो की संभावित मौजूदगी इस बात का संकेत है कि आने वाला मानसून चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सही जानकारी, समय पर योजना और आधुनिक कृषि तकनीकों के जरिए इन चुनौतियों से काफी हद तक निपटा जा सकता है। जागरूक रहें, मौसम अपडेट पर नजर रखें और अपनी खेती की रणनीति को बदलते हालात के अनुसार ढालें।









